आजमगढ़ : पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र जी की 120वीं जयंती के अवसर पर विचार-गोष्ठी कार्यक्रम का किया गया आयोजन

भारतीय साहित्य के निर्माता, स्वतंत्रता सेनानी, नाटककार एवं महाकवि पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र जी की 120वीं जयंती के अवसर पर आज नेहरू हाल के सभागार में विचार-गोष्ठी कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

आजमगढ़ आधुनिक हिंदी नाटक के जन्मदाता, भारतीय साहित्य के निर्माता, स्वतंत्रता सेनानी, नाटककार एवं महाकवि पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र जी की 120वीं जयंती के अवसर पर आज नेहरू हाल के सभागार में विचार-गोष्ठी कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे श्री रामसुधार सिंह ने कहा कि पंडित जी अपने समय के सजग दृष्टा थे, उन्होंने सांस्कृतिक एवं पौराणिक रचनाएं की। उन्होंने कर्ण के जीवन पर भी काव्यात्मक रचना की। वह भारतीय राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत थे। श्री मिश्र जी विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी में मौलिक भाषाओं के प्रयोग के समर्थक थे, उन्होंने हिंदुस्तानी भाषा को आगे बढ़ाया। श्री मिश्र जी कहते थे कि भारत की आर्थिक प्रगति का रास्ता भारत की माटी से ही होकर जाता है। श्री सिंह ने कहा कि आज ऐसे विद्वानों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि महाराजा सुहेलदेव राज्य विश्वविद्यालय आजमगढ़ में उनके नाम पर एक बड़ा सभागार/भवन होना चाहिए तथा विश्वविद्यालय में श्री मिश्र जी को एक विशेष कवि एवं नाटककार के रूप में पढ़ाया जाए। इनका चिंतन एवं सोच-विचार राष्ट्रहित में था।
उन्होने बताया कि भारतीय साहित्यिक परम्परा में राष्ट्रभाषा हिन्दी के अनन्य साधक, आधुनिक हिन्दी नाटक के जन्मदाता, भारतीय साहित्य के निर्माता, अमर नाटककार, महाकवि एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व0 पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र जी ’प्रखर’ सूर्य के समान देदीप्यमान हैं। समीक्षकों ने उन्हें नाट्य सम्राट की संज्ञा से विभूषित किया है। वे भारतीय भाव-बोध के पारम्परिक रचनाकारों में शीर्ष पर समलंकृत हैं। भास, भवभूति एवं कालिदास उनके प्रेरणा स्रोत थे। उनका मन्तव्य था कि भारतीय संस्कृति के प्राचीन मूल्यों को स्थापित किया जाए। वे साधिकार कहते थे कि उद्दात भारतीय संस्कृति में निहित मूल्यों के समादर में ही विश्व का कल्याण निहित है। अपनी इस विचारधारा की पुष्टि में वे सदा अपनी लेखनी से राष्ट्रीय महायज्ञ में आहुति देते रहे, साथ ही अपनी पौराणिक आस्था को नाटक के माध्यम से नया संदर्भ भी देते रहे। इस अर्थ में श्री मिश्र जी को सर्वविधायिनी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार कहा जा सकता है। उनकी नवोन्मेषशालिनी लेखकीय क्षमता ने सबको आश्चर्यचकित कर दिया। आज की बदलती परिस्थितियों में पं0 मिश्र जी की प्रासंगिकता और बढ़ गयी है। ऐसे समय जबकि देश प्रगति के पथ पर अग्रसर है, श्री मिश्र जी ज्ञान के अक्षय स्रोत के रूप में याद किए जाते रहेंगे, ऐसा मेरा आत्मिक विश्वास है। मानवीय रिश्तों, भारतीय संस्कृति, नैतिकता एवं राष्ट्रीयता की भावना को पुनर्प्रदीप्त करने के लिए मिश्र जी का स्मरण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस आवश्यकता की प्रतिपूर्ति में निःसंदेह इस दिशा में राष्ट्रीय पुस्तक ’न्यास’ (एन0बी0टी0) भारत सरकार द्वारा संकल्पित होकर पं0 मिश्र जी की साहित्यिक कृतियों को आम जनमानस के मध्य उपलब्ध कराने हेतु अनवरत् किया जा रहा सार्थक प्रयास सराहनीय है।
इस अवसर पर अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व श्री आजाद भगत सिंह ने कहा कि आजमगढ़ की माटी ने ऐसे व्यक्तित्व को दिया है, जिसे सुनकर, जानकर गौरवान्वित होते हैं। पंडित जी ने आजमगढ़ को बहुत कुछ दिया, उनके ऋण को चुकाया नहीं जा सकता है। उन्होंने कहा कि श्री मिश्र जी के नाटकों का मंचन करते रहें, जिससे उनका संदेश समाज में जाता रहे। उन्होंने डीआईओएस को निर्देश दिया कि विद्यालय स्तर पर प्रयास कर एक टीम तैयार करें, जिससे नाटकों का मंचन कराया जाए। उन्होंने आश्वासन दिया कि प्रशासन अपने दायित्व का निर्वहन करेगा, जो कुछ भी आवश्यकता होगी, प्रशासन मदद करेगा।
इसी के साथ ही अपर जिलाधिकारी प्रशासन श्री अनिल कुमार मिश्र ने भी पं0 लक्ष्मीनारायण मिश्र जी के जयंती के अवसर पर अपने विचार व्यक्त किये।
इससे पूर्व प्रातः में जिला प्रशासन द्वारा नगर पालिका चौराहे पर आयोजित माल्यार्पण कार्यक्रम में जनपद न्यायाधीश श्री जितेंद्र प्रताप सिंह, जिलाधिकारी श्री विशाल भारद्वाज, पुलिस अधीक्षक श्री अनुराग आर्य सहित अन्य जनपद स्तरीय अधिकारियों ने पं0 लक्ष्मी नारायण मिश्र जी की मूर्ति पर माल्यार्पण किया।
इस अवसर पर प्रवीण सिंह, नरसिंह, शशि भूषण, प्रशान्त, प्रेम प्रकाश, प्रेमी जी सहित संबंधित अधिकारीगण एवं अन्य लोग उपस्थित रहे।