*TV20 NEWS || PRAYAGRAJ: नागा साधुओं का भस्म सिर्फ राख नहीं,छिपे होते हैं कई विटामिन, जानिए क्या है विज्ञान!*

प्रयागराज। नागा साधु कठोर तपस्या और साधना के लिए जाने जाते हैं। वे भगवान शिव के परम भक्त होते हैं और अक्सर महाकुंभ जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों में देखे जाते हैं। इन साधुओं का जीवन पूरी तरह से सांसारिक सुखों से दूर होता है, लेकिन एक बात जो अक्सर लोगों के मन में उठती है, वह यह है कि ये साधु अपने शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं? आइए, जानें इसके धार्मिक और ऐतिहासिक कारणों के बारे में। नागा साधु अपने शरीर पर भस्म या राख लगाते हैं, जिसे वे ‘भभूत’ भी कहते हैं। भस्म का उपयोग एक धार्मिक प्रतीक के रूप में किया जाता है और यह पवित्रता का प्रतीक मानी जाती है। भगवान शिव के भक्त होने के कारण, नागा साधु चिता की राख या धूनी की राख अपने शरीर पर लगाते हैं। यह उन्हें नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है और मानसिक शांति प्रदान करता है।
भस्म बनाने की प्रक्रिया काफी लंबी होती है। हवन कुंड में पीपल, पाखड़, रसाला, बेलपत्र, केला और गाय के गोबर को जलाकर राख तैयार की जाती है। फिर इस राख को छानकर कच्चे दूध में लड्डू बनाया जाता है। इसे सात बार अग्नि में तपाकर और फिर कच्चे दूध से बुझाया जाता है। यह प्रक्रिया भस्म को शुद्ध और पवित्र बनाने के लिए की जाती है। इस भस्म को बाद में नागा साधु अपने शरीर पर लगाते हैं। कई लोग यह सवाल करते हैं कि जब नागा साधु ठंड के मौसम में बिना कपड़ों के रहते हैं, तो उन्हें ठंड नहीं लगती। इसका एक मुख्य कारण यह है कि भस्म शरीर के तापमान को नियंत्रित करती है। भस्म शरीर पर एक इंसुलेटर का काम करती है, जिससे साधु ठंड या गर्मी से प्रभावित नहीं होते। इसमें कैल्शियम, पोटैशियम और फास्फोरस जैसे खनिज होते हैं, जो शरीर के तापमान को संतुलित रखने में मदद करते हैं। नागा साधु भस्म को सिर्फ शरीर को गर्म रखने के लिए नहीं लगाते, बल्कि यह उनके साधना और तपस्या का हिस्सा है। वे मानते हैं कि भस्म शरीर को शुद्ध करती है और आत्मिक शक्ति को बढ़ाती है। यह उन्हें मानसिक शांति, स्थिरता और ध्यान की गहरी स्थिति में मदद करती है। इसके अलावा, भस्म को लगाने से साधु अपने शरीर के सारे भौतिक बंधनों से मुक्त होते हैं और वे पूरी तरह से आत्मा की साधना में लीन हो जाते हैं। नागा साधु अपने शरीर पर भस्म लगाकर निर्वस्त्र रहते हैं और अपने शरीर की रक्षा के लिए चिमटा, चिलम, कमंडल जैसे वस्त्र और हथियार रखते हैं। उनके पास त्रिशूल, तलवार और भाला होते हैं, जो उन्हें आत्मरक्षा और धर्म की रक्षा के प्रतीक माने जाते हैं। उनकी बड़ी-बड़ी जटाएं और उनके मस्तक पर तीनधारी तिलक (त्रिपुंड) उनके विशेष रूप को दर्शाते हैं। भस्म न केवल उन्हें ठंड और गर्मी से बचाती है, बल्कि यह उनके मानसिक और आत्मिक शुद्धिकरण का भी एक तरीका है। इस प्रक्रिया के जरिए नागा साधु अपने आप को ईश्वर के प्रति पूरी तरह समर्पित और सांसारिक मोह-माया से मुक्त कर लेते हैं।
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