*TV20 NEWS|| PRAYAGRAJ :रेप पीड़िता का Character assassination अनुच्छेद 21 के तहत महिला की गरिमा का उल्लंघन, हाई कोर्ट ने वकील को फटकारा*
रेप पीड़िता का Character assassination अनुच्छेद 21 के तहत महिला की गरिमा का उल्लंघन, हाई कोर्ट ने वकील को फटकारा

सिंगल बेंच ने अधिवक्ता के इस आचरण पर भी आपत्ति जताई कि उसने खुले तौर पर यह कहकर कोर्ट को धमकाया कि उसके आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी. बेंच बेचन प्रसाद की आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसने आईपीसी की धारा 376 और एससी/एसटी अधिनियम के तहत दर्ज मामले की सुनवाई के संबंध में उसके खिलाफ दायर संज्ञान आदेश और चार्जशीट को चुनौती दी थी.
अभियोजन पक्ष के अनुसार प्रकरण यह था कि पीड़िता एक शादीशुदा महिला है. वह अपने इलाज के लिए अपीलकर्ता के क्लिनिक गई. आरोप है कि दवा देने के बहाने अपीलकर्ता ने उसे नींद की गोली दे दी. इसके चलते पीड़िता बेहोश हो गयी तो उसके साथ बलात्कार किया गया.
ट्रायल कोर्ट के संज्ञान लेने के आदेश को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पीड़िता पैसे ऐंठने के लिए लोगों को ब्लैकमेल करने की हैबिचुअल है. अपने तर्क का समर्थन करने के लिए आरोपी के अधिवक्ता ने पांच व्यक्तियों के हलफनामों पर भरोसा किया, जिन्होंने आरोप लगाया कि पीड़िता “आसान चरित्र वाली महिला” (Character assassination) थी. इसका विरोध करते हुए एजीए ने कहा कि पीड़िता का धारा 161 और 164 के तहत तुरंत बयान दर्ज किया गया.
दोनों बयानों में पीड़िता ने अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन किया. तर्क दिया गया कि इंवेस्टिगेशन आफिसर ने कानूनी रूप से साक्ष्यों को एकत्र करने के बाद ही चार्जशीट तैयार की और उसे कोर्ट में पेश किया. इसके बाद ट्रायल कोर्ट का संज्ञान लेने का आदेश किसी भी अवैधता से ग्रस्त नहीं है.
बहस के दौरान कोर्ट ने अपीलकर्ता के वकील से बार-बार अनुरोध किया कि वे अपनी दलीलें केस डायरी में मौजूद मटेरियल तक ही सीमित रखें लेकिन उन्होंने बाहरी मटेरियल के आधार पर दलीलें देने पर फोकस किया. आदेश में कहा गया कि संबंधित वकील ने कोर्ट में यह भी कहा कि वह इस मामले पर विस्तार से बहस करेंगे और अगर जरूरी हुआ तो सुप्रीम कोर्ट में आदेश को चुनौती देंगे.
कोर्ट ने Character assassination पर आपत्ति जताई
कोर्ट ने उनके इस व्यवहार को “स्पष्ट रूप से अनुचित और वकालत के स्थापित नियमों के विपरीत” बताया. कोर्ट ने पांच व्यक्तियों द्वारा दायर हलफनामों (जो केस डायरी का हिस्सा नहीं थे) में इस्तेमाल की गई भाषा (Character assassination) पर भी आपत्ति जताई, जिसमें मूल रूप से पीड़ित के चरित्र और गरिमा (Character assassination) पर हमला किया गया.
“किसी महिला को ‘आसान चरित्र’ (Character assassination) वाली दिखाने की कोई भी कोशिश या उसके नैतिक चरित्र पर लांछन लगाना पूरी तरह से गलत है और इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 53A और धारा 146 के प्रोविज़ो के तहत साफ तौर पर मना है. ये आरोप चरित्र हनन के बराबर हैं.”
बेंच ने यह टिप्पणी की
“यह अच्छी तरह से तय है कि किसी महिला के पिछले आचरण या चरित्र (Character assassination) का इस्तेमाल उसे बदनाम करने या उसके कानूनी अधिकारों को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता. इसलिए विवादित बयानों को सभी उद्देश्यों के लिए हटा दिया जाना चाहिए और नजरअंदाज़ किया जाना चाहिए.”
बेंच ने आगे टिप्पणी की
“यह कोर्ट अपीलकर्ता के वकील के आचरण की निंदा करता है, जिसने ऐसे हलफनामे संलग्न करने और उन पर भरोसा करने का अनुचित और अस्वीकार्य तरीका अपनाया है जिनमें एक महिला के चरित्र (Character assassination) और गरिमा पर सवाल उठाने वाले अपमानजनक आरोप हैं. ऐसी दलीलें एक वकील के लिए पूरी तरह से अशोभनीय हैं और नैतिक वकालत की नींव पर ही हमला करती हैं.”
बेंच की टिप्पणी





