हर जनपद में एक सरकारी मेडिकल कॉलेज और प्राईवेट अलग से। श्याम सुंदर गुप्ता
नर्सिंग काॅलेजेज, पैरामेडिकल काॅलेजेज की बाढ़ तो पहले ही प्रदेश में आही चुकी है। उत्तर प्रदेश में लगभग 500 Nursing Schools और Colleges हैं और जनपद ( ज़िले ) शायद 75; मात्र उत्तर प्रदेश में बारहवीं के बाद आज की तिथि में लगभग 43 हज़ार छात्र छात्राएँ प्रतिवर्ष नर्सिंग काॅलेजेज / स्कूल्स में प्रशिक्षण हेतु प्रवेश लेती / लेते हैं। ( पैरामेडिकल्स अलग हैं इस संख़्या से। )
इस ही प्रकार मात्र उत्तर प्रदेश में प्रतिवर्ष लगभग 9 हज़ार MBBS के छात्र-छात्राएं प्रवेश लेते हैं, सरकार आमादा है कि जितनी जल्दी हो सके यह संख़्या शीघ्र 20 हज़ार हो जाये ।
चाहें मेडिकल कॉलेज ( Allopath एवं AYUSH दोनों ) हों या नर्सिंग काॅलेज या पैरामेडिकल काॅलेज।
बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर बना होता है।
पर चाहें आप सोने की दीवार बनवा दीजिए, चांदी के Equipment ले आईये, अच्छे शिक्षक और छात्र नहीं ख़रीद सकते।
पहले तो ऐसे लोग फेकल्टी अपाॅइंट होंगें , बल्कि कई तो हो ही चुके हैं ( NMC / INC / Paramedical Councils के मानक पूरा करने के लिए ) जिनको Carpal और Tarsal में अंतर नहीं पता होता / होगा और अध्यापन के नाम पर Google ताऊ से Slide Show download करके लैक्चर के दौरान चला भर देते हैं / देंगें।
हालाँकि लगभग सभी प्राइवेट / कुछ सरकारी मेडिकल काॅलेजेज , नर्सिंग, पैरामेडिकल काॅलेजेज के 75% शिक्षक आज भी यही कर रहे हैं।
अब लगभग अधिकांश छात्र छात्राओं पर आते हैं।
( कुछ बेहतरीन भी होते हैं, अपवादस्वरूप ) ।
अनुशासन, सीखने की ललक 90% में है ही नहीं।
हम अपने UG, PG के दिन याद करें तो कितने पारिवारिक समारोह हमारी तपस्या की भेंट चढ़ गये।
एक PG Resident ( MD 1st year ) अभी एक मेडिकल काॅलेज में 2 weeks पहले Serum Creatinine 3.0 वाले रोगी को DICLOFENAC BD IM prescribe करके चला गया।
उस मेडिकल काॅलेज में कार्यरत मेरे एक Batch mate ने यह बताया।
भले वह प्राईवेट काॅलेज से MBBS हो और वहाँ बिल्कुल अध्ययन न किया हो
पर NEET PG qualify करके आया है।
रैंक भले ऐसी हो कि माइक्रोस्कोप से दिखे, यह अलग बात है।
लेकिन विचारणीय है कि NEET PG Qualify भी कैसे कर लिया?
साक्षात्कार के लिए आईं 90% से अधिक नर्सिंग स्टाॅफ GNM का पूरा नाम नहीं लिख पातीं। 10 बीमारियों के नाम ही नहीं आते, उनकी सही Spelling लिखना तो बहुत ही कठिन बात हो गयी।
और
ऊपर से तुर्रा यह कि During Job सीखना / पढ़ना भी नहीं चाहतीं।
अब बात करते हैं रोगियों की, अधिकांश नव निर्मित अथवा विगत 10-15 वर्षों से संचालित मेडिकल काॅलेजेज / नर्सिंग काॅलेजेज / पैरामेडिकल काॅलेजेज में रोगियों का ऐसा विकट अकाल है कि बयान नही किया जा सकता।
जो विरले छात्र-छात्राएं सीखना चाहते हैं उनको रोगी उपलब्ध नहीं होते।
यह सोचकर डर लगता है कि हमारे बुढ़ापे में हमारा और हमारी अगली पीढ़ी का उपचार यही चिकित्सक, नर्सिंग स्टाॅफ और पैरामेडिकल्स करेंगें।
( समर्थ तो योरोप, अमैरिका में उपचार करवा ही लेंगें। )
कुल जमा यही है कि Quantity बढ़ाते समय Quality पर समझौता न हो इस पहलू पर किसी का ध्यान नहीं है।
सब रसातल में जा रहा है, चमत्कार का ही आसरा है।






