TV 20 NEWS || AZAMGARH :भविष्य का पूर्वांचल: ‘नेट-जीरो’ और रेजीलियंट हाउसिंग का नया क्षितिज

लेखक: प्रियंका जायसवाल
एसोसिएट मेंबर (IEI, कोलकाता) एवं जूनियर इंजीनियर (R.E.D.)
उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल क्षेत्र आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ प्रकृति का बदलता मिजाज और बढ़ती आबादी का दबाव हमारे बुनियादी ढांचे की परीक्षा ले रहा है। एक तरफ गंगा और घाघरा के कछार में बढ़ता बाढ़ का जोखिम है, तो दूसरी तरफ रिकॉर्ड तोड़ती गर्मी। एक सिविल इंजीनियर के रूप में मेरा स्पष्ट मानना है कि अब हमें सिर्फ छतें नहीं देनी हैं, बल्कि एक ऐसी ‘इंजीनियरिंग क्रांति’ की ओर बढ़ना है जो पूर्वांचल के घरों को ऊर्जा का उपभोक्ता नहीं, बल्कि ऊर्जा का संरक्षक बनाए। किफायती आवास (Affordable Housing) की परिभाषा अब केवल कम लागत तक सीमित नहीं रह सकती; इसमें ‘सस्टेनेबिलिटी’ का वह तत्व जुड़ना अनिवार्य है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों को सुरक्षित रखे।
इस समाधान की पहली कड़ी ‘ऊर्जा संरक्षण’ (Energy Conservation) है। हमें भवनों को एक जीवित इकाई की तरह डिजाइन करना होगा। पूर्वांचल में ‘थर्मल कम्फर्ट’ प्राप्त करने के लिए उच्च तापीय द्रव्यमान (High Thermal Mass) वाली सामग्री और ‘रिफ्लेक्टिव रूफिंग’ का उपयोग बिजली की खपत को 30% तक कम कर सकता है। जब हम भवनों का ओरिएंटेशन सूर्य की दिशा के अनुरूप रखते हैं, तो हम कृत्रिम रोशनी और एयर कंडीशनिंग की निर्भरता को न्यूनतम कर देते हैं। ऊर्जा का यह संरक्षण न केवल मध्यम वर्ग की जेब को राहत देगा, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर जलवायु परिवर्तन के खिलाफ एक बड़ा कदम साबित होगा। यह इंजीनियरिंग का वह मौन योगदान है जो शोर कम और काम ज्यादा करता है।
सस्टेनेबिलिटी को निर्माण प्रक्रिया के केंद्र में लाने के लिए हमें मिट्टी की ईंटों के मोह से बाहर निकलना होगा। फ्लाई-ऐश ब्रिक्स और ऑटोकलेव्ड एयरेटेड कंक्रीट (AAC) ब्लॉक्स का उपयोग एक साथ दो लक्ष्यों को साधता है—खेतों की उपजाऊ मिट्टी का संरक्षण और थर्मल इन्सुलेशन। इसके अलावा, पूर्वांचल के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए ‘स्टिल्ट और एम्फीबियस डिजाइन’ को मुख्यधारा में लाना होगा। ‘माईवन’ (Mivan) और प्री-कास्ट कंक्रीट जैसी आधुनिक तकनीकें न केवल निर्माण समय को आधा करती हैं, बल्कि सामग्री के अपव्यय (Waste) को भी शून्य के करीब ले जाती हैं। सस्टेनेबिलिटी का अर्थ ही यही है—न्यूनतम संसाधनों से अधिकतम और स्थायी निर्माण।
अंततः, किसी भी संरचना की आत्मा उसकी सुरक्षा और गुणवत्ता में बसती है। IS 456:2000 और IS 1893 जैसे कड़े मानकों का पालन करना केवल एक कागजी प्रक्रिया नहीं, बल्कि जन सुरक्षा का संकल्प है। NDT (Non-Destructive Testing) जैसी तकनीकों का नियमित प्रयोग हमारे इंफ्रास्ट्रक्चर की उम्र बढ़ाता है। जब हम रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को एक अनिवार्यता बना देंगे और सोलर पैनलों को हर घर की पहचान, तभी पूर्वांचल का ‘किफायती आवास’ सही मायने में ‘सार्थक आवास’ बनेगा। इंजीनियरिंग के इन उच्च मानकों और पर्यावरण के प्रति अटूट संवेदना के समन्वय से ही हम एक ऐसे आत्मनिर्भर पूर्वांचल की नींव रखेंगे, जो न केवल सुरक्षित होगा, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए एक रोल मॉडल बनेगा।