आजमगढ़, जब आजमगढ़ डाकखाने से कर्मचारी घोड़ा पुलिस की सुरक्षा में मनी आर्डर लेकर रामपुर गाँव आता था,  बिसेनों और मल्लों की इतिहास गाथा…  डॉ अरविंद सिंह की कलम से

 

राजतारा – संघर्ष- गाथा के बहाने.. भाग-1

( राज- राजबहादुर सिंह – पिताजी, तारा – तारादेवी- माँ)
(बिसेन वंश की आधारशिला)
उत्तर भारत के जितने भी राजवंश थे, उसमें सबसे शक्तिशाली राजवंश के रूप में ‘मझौलीराज’ (देवरिया) की ख्याति मानी जाती है.इसके पूर्व यह ‘मल्लराज’ था. जबकि रामायण कालीन यह ‘मध्यवलिया’ था. कोशल और विदेह राज्यों के मध्य में पड़ने वाला गंगा का यह विशाल मैदानी क्षेत्र इसी कारण ‘मध्यवलिया’ कहलाया. सामरिक रूप से तीन तरफ से गंडक नदी से घिरे होने का कारण यह मल्लों की राजधानी थी. 16 महाजनपदों में भी इसका उल्लेख है. यह मल्लवंश की राजधानी थी. एक मान्यता के अनुसार भगवान राम के बाद कोशल राज्य के दो भाग हुए पहले पर उनके पुत्र कुमार लव ने श्रावस्ती को राजधानी बनाया जो अयोध्या तक फैला था. जबकि दूसरे पर कुश ने कुशीनगर को राजधानी बना पूर्वी कोशल राज पर राज किया.
भगवान राम के अनुज लक्ष्मण के दो पुत्र हुए अंगद और चन्द्रकेतु. चन्द्रकेतु का राज्य सुदूर दक्षिण में कर्नाटक तक था. बाद में अयोध्या के बुलावे पर कुशीनगर पर चन्द्रकेतु ने राज्य संभाला. चन्द्रकेतु मल्लयुद्ध में निपुण थे.उनके इस कला और कौशल से उनके द्वारा शासित राज्य को ‘मल्ल राष्ट्र’ या मल्ल देश कहा गया. बाद में यह मल्ल महाजनपद कहा गया. बढ़ते कालखंड में इस राजवंश के सबसे प्रतापी और ताकतवर राजा पृथ्वी मल्ल हुए. लगभग सभी मल्ल राजाओं पर महात्मा बुद्ध का प्रभाव था.
मल्ल देश के एक राजा महाराज विश्वसेन (सम्भवतः १००० ई.सा. पूर्व ) के ९३वें वंशज राजा रघुवंश मल्ल ने सन् १३०० के आसपास ‘मझौली राज’ की स्थापना की. ये मल्ल कुल अपने आपको चन्द्रकेतु के वंशज बताते हैं और अपना उपनाम ‘मल्ल विशेन’ लिखते हैं मल्ल उपनाम के लोग भारत के उत्तर प्रदेश,बिहार, उत्तराखंड, हिमाचल सहित नेपाल में निवास करते हैं और महाराज विश्वसेन के नाम से बने इस वंश विशेन से यह बिसेन राजपूत/ बिसेन क्षत्रिय कहलाए. इस वंश की कुलदेवी माँ दुर्गा, गण- वत्स और यज्ञोपवीत की उम्र- 12 वर्ष है.

मल्ल वंश/ बिसेन वंश का आजमगढ़ में प्रसार :-
बुजुर्गों की कथाओं और मिशकों के अनुसार इसी ‘मझौलीराज’ देवरिया, बिसेन वंश से पांच भाई कभी आजमगढ़ आए. दो किन्हीं कारणों से कालकवलित हो गयें, लेकिन तीन बिसेन राजपूत इस जिले के जहानागंज-विकास खंड पहुंचे. एक भाई कोल्हूखोर गाँव में जा बसा, तो दो भाई रामपुर गांव. एक भाई की वंश परंपरा में गांव की आबादी है, तो दूसरे भाई की वंशवृक्ष परंपरा में बलवंदा सिंह,बलवंत और दीलिप सिंह हुए.1901 के राजस्व अभिलेखों के अनुसार भवन सिंह नाम के व्यक्ति के तीन पुत्र- बल्ली, गज्जू और कुमार हुए. जबकि भज्जन के दो पुत्र भगवती और सूबेदार हुए. महावीर नावल्द थे. बल्ली सिंह के छह पुत्र फौजदार, हवलदार, रामधानी, जंगली, चन्द्रिका और लालता हुए. तो गज्जू के एकमात्र पुत्र कालिका हुए. तथा कुमार फिर नावल्द हो गयें.
जंगली सिंह के तीन पुत्र राजबहादुर, शेषनाथ और छविनाथ. तथा राजबहादुर सिंह के दो पुत्र बीरेंद्र सिंह और अरविंद सिंह हुए. लेखक का संबंध इसी बिसेन वंशवृक्ष से है और वह इसवंश परंपरा में 6वीं पीढ़ी में आता है. यानि पूरे गाँव का एक
तिहाई में उसके पूर्वजों की हिस्सेदारी थी. बाबा बताते थे कि उनके पिता बल्ली सिंह चौधुर थे. पूरे गांव और खित्ते में पंचायत तोड़ने जाते थे. जबकि उनके भाई गज्जू के बारे में अनेक जातक कथाएँ प्रचलित हैं. गज्जू बहुत बड़े लठैत थे.अपनी लाठी में सवा मन का लोहबन्ना लगाते थे. घर के एक दर्जन से अधिक पशुओं-भैसों और बैलों का चारा बिना चारा मशीन के गड़ांसे से प्रतिदिन बालते थे. उनकी लाठी से अंगार बरसता था. सुबह-सुबह अभ्यास के लिए हवा में लाठी भांजते तो दूर खड़े व्यक्ति को भी उसकी रफ्तार की आवाज सुनाई देती थी. जिस कालखंड में परिवार की ताकत व समृद्धि जनधन और पशुधन से लगायी जाती और पुरुषार्थ खेतीबाड़ी से तब भी यह परिवार सभी तरह से संपन्न था. गज्जू सिंह के एकमात्र लंबा-चौड़ा और गोरा-चिट्ठा नौजवान पुत्र कालिका सिंह, तब के पूरब के देस कलकत्ता में बंगाली समाज में एक प्रतिष्ठित जननेता थे और उन्होंने दर्जन भर से ऊपर बाडी और दुकानें कलकत्ता में अपनी मेहनत और पौरुष से बनायी थी. अज्ञात कारणों से उनका कलकत्ता में ही निधन हो गया और उनकी बनायी गयी सम्पत्ति बंगालियों ने कब्जा कर लिया.
गज्जू सिंह के भाई बल्ली सिंह को गांव वाले बल्ली दादा कहते थे. जो बल और बुद्धि दोनों ही तत्वों से निर्मित थे. न्याय बतियाते और करते भी. उनके छह पुत्रों में सबसे बड़े फौजदार थे. दूसरे नंबर पर हवलदार उर्फ झिंगई थे. मिलिट्री में हवलदार थे, इसलिए लोगों के बीच उनके पदनाम को ही जन-मान्यता मिल गयी और झिंगई समय की धारा पर हवलदार हो गयें. फौज से आने के बाद घर पर खेती किसानी यही संभालते थे. हर काम को पूरे मनोयोग से करते थे. बडी शौकीन खेती थी. दूध दही और गोरस के आखिरी पारखी और शौकीन थे. परिवार के लिए जीवन भर अविवाहित रहे. घर पर तब बैलगाड़ी थी, जिसे प्रायः यही हांकते थे, इसलिए इनका एक और उपनाम गडुवान( गाड़ीवान) भी था. तब के समाज में आज के ट्रकों से ज्यादा तब की बैलगाड़ी की प्रतिष्ठा थी. इस गाड़ी में दो बैल दाहिने-बाएं और एक बैल आगे नधता था. आगे वाला बैल को बिढिया कहा जाता था. यह बिढिया बहुत बुद्धिमान और ताकतवर होता था. गडढ़े में पड़ने पर घूटने पर झुक गाडी खींच कर बाहर निकाल देता है. चाहे जितना भारी सामान लदा हो. कई कोस के माने में झिंगई बाबू बैलगाड़ी कौतुहल का विषय होती थी. क्षेत्र में यह किंवदंती कही जाती थी कि- “ई घर क मरदा.. और बरधा दोनों का कोई जोड़ नहीं था.”. उनसे छोटे रामधनी सिंह तब रंगून कमाने गयें थे. कलकत्ता से पानी की जहाज़ से कई दिन रात की यात्रा के बाद रंगून पहुंचते थे. इनका परिवार भी रंगून में ही रहता था. इनका सबसे बड़ा पुत्र यहीं पैदा हुआ था. जब एक आना दो आना देखने को नहीं मिलता था, तब रामपुर में एक हजार का मनी आर्डर आता था. आजमगढ़ डाकखाने का कर्मचारी घोड़े से पुलिस की सुरक्षा में मनी आर्डर लेकर रामपुर आता और मनी आर्डर रिसीव कराता था. रास्ते में इतनी बड़ी धनराशि को कोई लूट न लें. इसलिए सुरक्षा की पूरी व्यवस्था करनी पड़ती थी. आज भी रंगून से आयी चारपाईयां और अन्य सामान इस समृद्धि की कहानी बयां करती हैं.
(क्रमशः कुटुंब-गाथा-1)