साहब का कुत्ता..
@ डॉ अरविंद सिंह (तिरछी नज़र का दोष)
यह कोई मामूली कुत्ता थोडे़ नहीं है.यह साहब का कुत्ता है. यह उस आईएएस दंपत्ति का महान कुत्ता है, जो अपने इस विशेष कुत्ते के लिए दिल्ली के एक पूरे स्टेडियम को खाली करा दिया..साहब की तरफ से खिलाड़ियों और कोच को यह सख्त निर्देश दे दिए गए थे- कि साहब के इस एलीट क्लास के कुत्ते के हवा-पानी के लिए जब आगमन हो तो, मैदान साफ होना चाहिए. जिससे उसके टहलने में कोई बांधा नहीं हो, कोई यह पूछने वाला या टोकने वाला नहीं हो कि- साहब का यह कुत्ता देश के लिए मेडल लाने और इस स्टेडियम में पसीना बहाने वाले खिलाड़ियों से श्रेष्ठ प्रजाति का आखिर कैसे है, इसका भी जवाब है-क्योंकि इस विशेष कुत्ते की मानसिकता
किसी जर्मन शेफर्ड है या बुलडाग कुत्ते की तरह थोड़ी न है. वह तो आईएएस साहब का कुत्ता है. बिल्कुल उन्हीं की तरह सोचता है, विचारता है, उसी लाइफ स्टाइल में जीता है, कुलीनता के चरम पर चढ़ तांडव करता है और उस मानसिकता में लोगों को दास समझता है. इस डेवलपमेंट तक पहुँचना आसान थोड़े न है. इस जीवन स्तर तक पहुँचने के लिए कुत्ते को आदमी बनना पड़ा होगा. इस जटिल और महान लक्ष्य के लिए उसे बहुत मेहनत करनी पड़ी होगी. साहब और उनकी आईएएस मैडम को उसे विशेष रूप से मानसिक और उसकी शारीरिक रचना विज्ञान के स्तर से प्रशिक्षित करना पड़ा होगा. उसकी सोच से ‘कुत्ता समाज’ के मनोविज्ञान को निकाल कर, मानव समाज और उस पर भी आईएएस के मनोविज्ञान को प्रत्यारोपित करना पड़ा होगा…
आदमी को कुत्ता बनते तो सभी ने देखा और पढ़ा होगा, यहाँ तो कुत्ते को आदमी बनाने का मुश्किल और असंभव जैसा टास्क था. वह भी आईएएस के मनोविज्ञान और उस मानसिक स्तर तक पहुँचाना. इससे यह सिद्ध होता है कि एक आईएएस, मामूली कुत्ते को भी आदमी बना सकता है. यह चमत्कार केवल भारतीय नौकरशाह ही कर सकता है.
यह असंभव सा टास्क दुनिया के मानव और जीव विज्ञान के इतिहास में भले पहली बार हुआ हो, लेकिन इस कीर्तिमान को भारत ने करके दिखा दिया. हलकू और झबरा ‘पूस की रात’ में मालिक के फसलों की मवेशियों से रखवाली करने में अपनी श्वान-स्वामिभक्ति भले सिद्ध किया हो, लेकिन यहाँ मामला ‘एलिट वर्जन’ के डाग का है. कुत्ते ने दिल्ली के अपने आईएएस साहब और आईएएस मैम साहब के बीच 3500 किमी की विरह की दीवार खींच दी, लेकिन सवाल यह है कि कुत्ते से आदमी बना ‘कुत्ता’ अब किसके पास रहेगा. साहब के पास लद्दाख में..या मैम के पास अरूणाचल प्रदेश में.. दिल की राजधानी दिल्ली को छोड़ कर उसे पूर्वोत्तर भारत में कबतक रहना पडेगा..!
इसका जवाब भी भारत सरकार को देना पड़ेगा. या फिर सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी पड़ेगी कि- उससे हवाई मार्ग से दोनों मालिकों से डेली भेंट मुलाकात होती रहे.. नहीं तो यह आदमी की मानसिकता का कुत्ता, फिर कुत्ता बन जाएगा. और आदमी को ही कु.. बना देगा.
( व्यंग्य को व्यंग्य की ही तरह लें, व्यक्तिगत दिल पर नहीं)






