TV20 NEWS ||AZAMGARH :महाकवि कालिदास की शकुंतला सिर्फ एक नारी नहीं,प्रकृति की बेटी है -अरविंद चित्रांश

आजमगढ़ 28 अगस्त-2026। “शकुंतला का प्रकृति प्रेम,सावन की कजरी एंव नारी महत्व” पर साहित्यिक आयोजन,अंतरराष्ट्रीय भोजपुरी संगम भारत एवं गौरवशाली पूर्वांचल के प्रधान कार्यालय,कोलघाट आजमगढ़ में प्रसिद्ध साहित्यकार एवं मुख्यवक्ता डॉo ईश्वर चंद्र त्रिपाठी का भोजपुरी खंडकाव्य शकुंतला पर आधारित साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य पाठ का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता भोजपुरी के पितामह प्रसिद्ध कवि बालेदिन यादव और मुख्यअतिथि प्रसिद्ध साहित्यकार एवं गजलकार दिनेश श्रीवास्तव एंव संचालन भोजपुरी अकादमी एवं लोक कला शोध संस्थान के मुख्य प्रभारी अरविंद चित्रांश ने किया।
प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. ईश्वर चंद्र त्रिपाठी – भोजपुरी के वो रचयिता है। जिन्होंने संस्कृत के महाकवि कालिदास की अमर कृति “अभिज्ञान शाकुंतलम” की शकुंतला को भोजपुरी माटी में उतार दिये। आपके भोजपुरी खंडकाव्य ‘शकुंतला’ से यह सिद्ध होता है की नारी ही प्रकृति की सच्ची रक्षक है।
गौरवशाली पूर्वांचल के प्रधान संपादक एवं प्रभारी अरविंद चित्रांश ने कहा कि शकुंतला कण्व ऋषि की पालिता पुत्री थी, लेकिन असल में मेनका और विश्वामित्र की पुत्री थी।आश्रम में हिरण के बच्चे को अपना बेटा मानती है, पेड़-पौधों को पानी पिलाए बिना खुद पानी नहीं पीती थी। महाकवि लिखते हैं – जब शकुंतला ससुराल जाती है तो पूरा आश्रम रोता है, लताएं अपने पत्ते गिरा देती हैं, मोर नाचना बंद कर देते हैं! यही है प्रकृति प्रेम – जहाँ मनुष्य और प्रकृति एक परिवार हैं।
अध्यक्षता कर रहे हैं प्रसिद्ध गीतकार बालेदिन यादव ने कहा कि संस्कृत की इस कालजयी रचना को शुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिंदी में कई लोगों ने लिखा, लेकिन प्रसिद्ध साहित्यकार एवं भोजपुरी खंडकाव्य शकुंतला के रचयिता डॉ. ईश्वर चंद्र त्रिपाठी जी ने इस कालजयी रचना को भोजपुरी भाषा का गौरव दिया! प्रसिद्ध गीतकार राकेश पांडेय ‘सागर’ ने अपनी मधुर गीत प्रस्तुत करते हुए कहा कि डॉ ईश्वर चंद्र त्रिपाठी ने साबित किया कि भोजपुरी में भी कालिदास जैसी करुणा, श्रृंगार और दर्शन लिखा जा सकता है। भोजपुरी सिर्फ बिरहा-कजरी नहीं, महाकाव्य की भाषा भी है। अटपट बाणी के रचयिता शानदार कवि शैलेंद्र मोहन राय ‘अटपट’ ने अपने कविता पाठ के माध्यम से दर्द और पीड़ा को चित्रित करते हुए कहा कि डॉक्टर साहब ने शकुंतला को आंचलिक और सरल बनाया,उनकी शकुंतला अब महल की नहीं, संसार का गौरव,प्रकृति की बेटी लगती है। जो सावन में कजरी गाती है, जो बाग में फूल चुनती है, जो पेड़ को अपना भाई मानती है।
अरविंद चित्रांश ने कहा कि कालिदास वैदिक परंपरा के महाकवि हैं। त्रिपाठी जी ने उसी परंपरा को भोजपुरी में जीवित रखा है।शकुंतला,नारी की शक्ति है। सावन में औरतें झूला झूलते हुए गाती है। शकुंतला आश्रम के पेड़ों को सींचती है। आज की नारी सावन में कजरी गाकर खेत-खलिहान, नदी, झूला, मेघ को पूजती है। इससे साबित होता है कि नारी प्रकृति की रक्षक है।
शकुंतला भोजपुरी खंडकाव्य के रचयिता एवं प्रसिद्ध गीतकार डॉ ईश्वर चंद्र त्रिपाठी ने शकुंतला को दर्शाते हुए अपने काव्य पाठ से लोगों को बहुत रुलाया और कहा कि शकुंतला ने हमें सिखाया की नारी और प्रकृति अलग नहीं है,नारी ही सृजन की शक्ति है। नारी ही प्रकृति की रक्षक है, शकुंतला का प्राकृतिक प्रेम,कजरी की आत्मा है, जैसे धरती बीज से फसल बनाती है, वैसे नारी सावन के महत्व एवं कजरी गीतों से संस्कृति बनाती है। नारी के विरह में भी शक्ति है। शकुंतला दुष्यंत के विरह में भी अपने गर्भ की रक्षा करती है। सावन के महत्व को दर्शाने वाली नारी भी पति के परदेस जाने पर भी घर-परिवार संभालती है। परदेसिया के इंतजार की कजरी में रोना नहीं, ताकत है। प्रकृति को देवी मानना, शकुंतला के लिए वन देवी माँ जैसी है। कजरी में भी आम के बौर, गंगा की लहर, काले बादल सब सखी-सहेली हैं।
साहित्यिक संगोष्ठि एवं काव्य पाठ की अध्यक्षता कर रहे भोजपुरी के कवि साहित्यकार बालेदिन यादव, प्रसिद्ध साहित्यकार एवं गजलकार, ‘नियति चक्र’ महाकाव्य एवं ‘सुंदरम’ खंडकाव्य के रचयिता मुख्यअतिथि दिनेश श्रीवास्तव, सेवा भारती की महिला प्रभारी एवं समाजसेविका बिन्नी श्रीवास्तव एवं मधुकर श्रीवास्तव, श्रेया दुबे शानदार युवा कवयित्री एवं सुमन दुबे, अवधी संगीत प्रयागराज के शोधार्थी/ संगीतकार कंचन लता भारती, प्रसिद्ध कवि गीतकार अपने गीतों से महफिल सजाते हुए राकेश पांडेय सागर, डॉ अवनीश अस्थाना, डॉ सुभाष सिंह, अटपट वाणी के रचयिता प्रसिद्ध कवि शैलेंद्र मोहन राय ‘अटपट’, विकास भवन के पूर्व अधिकारी अतुल श्रीवास्तव, श्रीमती सारिका श्रीवास्तव, जानवी, अनामिका यादव,श्रेष्ठ सिंह,बिट्टू यादव, माही एवं अंशिका चित्रांश, पूज्य माता कैलाशपति देवी, प्रांजल पांडेय आदि महत्वपूर्ण लोग उपस्थित रहे।
अंत में संचालन कर रहे अंतरराष्ट्रीय भोजपुरी संगम भारत के अंतरराष्ट्रीय संयोजक अरविंद चित्रांश ने कहा कि महाकवि कालिदास की शकुंतला ने हमें सिखाया – नारी और प्रकृति अलग नहीं हैं। डॉ. ईश्वर चंद्र त्रिपाठी जी ने उसी शकुंतला को भोजपुरी में लाकर हमें याद दिलाया कि देश की हर कजरी गाने वाली मातृशक्ति उसी शकुंतला की वंशज है। जब वह सावन में कजरी गाती है तो वह सिर्फ गीत नहीं गाती, बल्कि अपनी धरती, अपने पेड़ और अपने पुरखों को याद करती है। यही नारी शक्ति है, यही पितृ-स्मृति है।